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Tuesday, 12 May 2015

35 . पैसा बोलता है ...

" अंकल, मेरे उत्तर पर मुझे जीरो दिया गया है क्या मैं गलत हूँ ?अंकल ,आप सही और ईमानदार जवाब देना " मेरे पडोसी कपूर साहेब का पंद्रह साल का लड़का मुझसे पूछ रहा था.


प्रश्न ये था "रावण को किसने मारा ?"

और कपूर साहब के लड़के ने जवाब दिया था "रावण को उसके  अहंकार ने मारा ."

उसकी टीचर ने न सिर्फ उसे जीरो दिया था बल्कि पूरी क्लास के सामने उसकी बेइज्जती भी की थी कि "हम पहली और दूसरी क्लास से ही ये सीखा रहे  है कि रावण को राम ने मारा और तुम इतने साल में भी ये याद नहीं कर पाये ."

मैंने उसे समझाने की  कोशिश की " हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें रटना सिखाती  है, इस शिक्षा व्यवस्था में सोचने पर पाबंदिया  होती है ,क्योंकि रटने पर जवाब सिर्फ एक ही होता है लेकिन सोचने पर जवाब एक से अधिक हो सकते है .और टीचर्स इतने मैच्योर और समझदार नहीं होते है कि एक से अधिक जवाब सुन और समझ सके क्योंकि ऑफ्टरऑल उन्हें भी रटना ही सिखाया गया है ."

 मैंने उसके चेहरे पर उलझन और न समझ में आने वाले भाव देखकर एक प्रयास और किया  " हमारी शिक्षा व्यवस्था औद्योगिक युग की है जहाँ बताये गए काम को ठीक उसी के अनुरूप करना होता था जैसा बताया गया है वहां क्रिएटिविटी के लिए कोई जगह नहीं होती थी और गलतियों के लिए कोई गुंजाइश भी नहीं होती थी लिहाजा एक सवाल का एक ही उत्तर - खांचे में फिट ,न कम न ज्यादा ,न छोटा न बड़ा .और हमारे  टीचर्स के लिए भी ये आसान था , उन्होंने एक बार रट  लिया और ज़िन्दगी गुजर गई . "

मेरी कोशिश असफल रही उसका विकसित होता दिमाग इस जड़ता को पचा नहीं पा रहा था ,जो जवाब पहली और दूसरी क्लास के लिए सही था वही जवाब दसवीं क्लास में भी ! क्या दिमाग नहीं बढ़ा ? फिर जवाब वही क्यों अटका हुआ है ? "रटने" से आगे हमारे टीचर्स "समझने" की शुरुआत क्यों नहीं करते ?

सालों से हमारे टीचर्स ,हमारे पेरेंट्स हमे कह रहे है "अच्छे से पढाई करो,अच्छे नंबर लाओ ,अच्छी नौकरी ढूंढो और अच्छे से गुजारा करो." इतनी बार दोहराया गया है कि हमे याद हो गया है ,हमने उनके दोहराये वाक्यों को रट लिया है ,लिहाजा हम पढाई या नौकरी से बाहर भी ज़िन्दगी होती है ये समझना ही नहीं चाहते है ,हमे रटाया गया याद है कि राम को रावण ने मारा और हम हमारी क्रिएटिविटी कि रावण को उसके अहंकार ने मारा भूल गए है ,भुला दिए गए है . हम एक चेक से दूसरे चेक का इंतज़ार करते है लेकिन खांचे के बाहर झांकने की हिम्मत और ज़ुर्रत नहीं करते कि टीचर हमे जीरो नहीं दे देवे .हमारी गरीबी की वजह ,पैसे की कमी की वजह रटाये गए जवाब है जिन्होंने हमारी क्रिएटिविटी ख़त्म कर दी है -  हमारे दिमाग को सीमित और संकुचित  कर दिया है.
सुबोध -
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